बचपन संवर नहीं पा रहा, दर-दर भटक रहें बच्चें

बचपन संवर नहीं पा रहा, दर-दर भटक रहें बच्चें

Contentshide1 बचपन संवर नहीं पा रहा, दर-दर भटक रहें बच्चें1.1 लाख योजनाओं के बाद भी नहीं संवर रहा बच्चों का बचपन1.2 पूरा करना है अपना टास्क:1.3 मजबूरी की भेंट चढ़ रहा बचपन

बचपन संवर नहीं पा रहा, दर-दर भटक रहें बच्चें

लाख योजनाओं के बाद भी नहीं संवर रहा बच्चों का बचपन

फ़ास्ट न्यूज़ नागौर : संवर नहीं पा रहा बचपनकरतब दिखाते बच्चें व चाय की होटल मे काम करने वाले छोटू

की बेबसी का जवाब शून्य में कहीं खो सा जाता हैं। सवाल तो यह भी है

कि जब अनेकों योजनाएं बच्चों के हितार्थ संचालितहोती हैं,

तो फिर बच्चों की ट्रेन में करतब दिखाने की बेबसी क्यों क्यों छोटू चाय की दुकान पर काम करने को मजबूर हैं।

बड़ी बात तो यह भी है कि छोटू के हाथ की चाय कई बड़े-बड़े लोग पीते हैं।

छोटू के चेहरे की बेबसी पता नहीं क्यों किसी को नजर नहीं आतीं।

भरे बाजार में अपने भाई के साथ जिम्नास्टिक व हाथ कला से करतब दिखातें बच्चे के करतब से भले ही कोई मनोरंजन

करें या नहीं लेकिन बच्चों के चेहरे पर नजर आने वाले सपाट भाव व बेबसी किसी भी यात्री को नजर नहीं आतीं।

इन बच्चों में से अधिकांश बच्चे ऐसे हैं जिनके अभिभावक उनसे इस तरह का कार्य करवाते हैं,

ऐसे बच्चों को स्कूल क्यों नहीं भेजा जाता है ? या फिर यह सामान्य बच्चों सा जीवन क्यों नहीं जी पाते हैं?

सवाल के कई जवाब हो सकते हैं। लेकिन कहीं न कहीं अनदेखी और अज्ञानता इसका प्रमुख कारण हैं।

पूरा करना है अपना टास्क:

हरसौर क़स्बे के पावर हाउस के पास पड़ी, खाली जगह पर यह गुम्मकड़ लोग रहेने आते हैं।

यह चार से पांच दिन यही रहते हैं। चार से पांच दिन के बीच से इन्हें हर गली व चौराहा पर जाकर

करतब दिखाकर अपना टास्क पुरा करना होता हैं। एक बच्चा हरसौर स्कुल चौराहा पर अपने उम्र के

भाई के साथ करतब दिखाते नजर आता हैं। बच्चों अपनी हाथ कला से राहगीरों का अपने और आकर्षक करता हैं।

तथा कई बार बच्चों को दो लकड़ी के खम्भे पर रस्सी बांध कर बीच मे अपने शरीर के नियंत्रण को बताते हुए करतब करते हैं।

भाई अपने चेहरे को अलग रंग से पोत कर सिर पर पहने अपने टोपी पर लगी लंबी सी डोरी को हवा में घुमाते हुए

नागरिकों का ध्यान अपनी ओर खींचने का प्रयास करता हैं। कभी लोहे की छोटी सी रिंग में से

गुजरते हुए मनोरंजन का प्रयास करता हैं। थोड़ी देर के प्रदर्शन के बाद बच्चें खामोश के साथ एक बर्तन को

एक-एक कर सभी नागरिकों व राहगीरों के सामने रखा करते है कोई नागरिक एक-दो रूपये दे देता हैं,

तो किसी यात्री के द्वारा आगे जाने का इशारा कर दिया जाता हैं। बच्चों का चहरा एकदम सपाट,

करतब दिखाने से लेकर यात्री के सामने अपना कटोरा करते हुए, बच्चों का चेहरा एकदम सपाट रहता हैं।

मजबूरी की भेंट चढ़ रहा बचपन

चाय की होटल हो या फिर किसी थड़ी पर काम करता कोई बच्चा। यह स्थिति केवल हरसौर की ही नहीं

बल्कि जिले सहित प्रदेश भर में ऐसे हजारों बच्चे हैं। जो कि काम करते नजर आ जाते हैं।

इस संबंध में जब पत्रिका ने जानकारी जुटाई तो सामने आया कि अधिकतर बच्चे अपने अभिभावकों की

मजबूरी के भेट ही चढ़ रहे हैं।माता-पिता स्वयं अपने बच्चों को होटल या अन्यत्र शारिरक श्रम करने के लिए भेज रहे हैं।

ऐसे माता-पिता का जवाब भी बड़ा सीधा होता है क्या करें बच्चा काम करता हैं, तो 4 पैसे घर में आ रहे हैं,

घर चल रहा हैं।

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